सागर । जिले में मातृ मृत्यु दर (MMR) तथा शिशु मृत्यु दर (IMR) को न्यूनतम स्तर पर लाने के लिए कलेक्टर श्रीमती प्रतिभा पाल लगातार मैदानी स्तर से लेकर उच्च चिकित्सा संस्थानों तक ठोस रणनीतिक कदम उठा रही हैं। कलेक्टर श्रीमती प्रतिभा पाल की अध्यक्षता में जिला स्वास्थ्य समिति की महत्वपूर्ण और विस्तृत समीक्षा बैठक आयोजित की गई।
बैठक की खासियत यह रही कि इसमें न केवल सीएमएचओ कार्यालय के जिला व ब्लॉक स्तरीय अधिकारी शामिल हुए, बल्कि जिला चिकित्सालय तथा बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ शिशु रोग विशेषज्ञ और एसएनसीयू इंचार्ज को भी एक मंच पर लाया गया।

कलेक्टर ने स्पष्ट किया कि इस संयुक्त मंथन का मुख्य उद्देश्य उन सटीक कारणों की पहचान करना है, जिनके चलते मरीज प्राथमिक / सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से रिफर होकर बीएमसी या जिला अस्पताल पहुँचते हैं और जो बाद में एमएमआर या आईएमआर में परिवर्तित हो जाते हैं। इन कारणों का विश्लेषण कर यह तय किया जा रहा है कि किस स्तर पर क्या चिकित्सीय एवं प्रशासनिक बदलाव आवश्यक हैं।
समीक्षा के दौरान एमएमआर या आईएमआर के मुख्य कारणों का विश्लेषण भी किया गया और बताया गया कि ज्यादातर प्रकरणों में माता में गंभीर एनीमिया की शिकायत तथा गर्भावस्था प्रेरित उच्च रक्तचाप की शिकायत होती है।
सर्वाधिक मामलों में मृत्यु की वजह पीआईएच (प्रेगनेंसी इंड्यूस्ड हाइपरटेंशन), हेपेटिक फेलियर, गंभीर एनीमिया तथा पोस्टपार्टम हैमरेज व एक्लेम्पसिया पाई गई।प्रीक्लेम्पसिया जिसमें (उच्च रक्तचाप और पेशाब में प्रोटीन) से पीड़ित महिला को अचानक दौरे पड़ने लगते हैं। ऐसे मामलों में समय पर मरीज को स्टेबल कर सही रिफरल प्रोटोकॉल का पालन किया जाए।
कलेक्टर ने निर्देश दिए कि जमीनी स्तर पर ही गर्भवती महिलाओं के नियमित बीपी और हीमोग्लोबिन की मॉनिटरिंग सुनिश्चित की जाए।
बैठक में डीन डॉ पी एस ठाकुर ने रेखांकित किया कि यदि माँ हाई-रिस्क गर्भवती है , तो उससे जन्म लेने वाला बच्चा भी हाई-रिस्क में ही आता है। एमएमआर और आईएमआर एक दूसरे से इसी प्रकार से संबंधित हैं। आज यदि हम हाई रिस्क माता का प्रबंधन नहीं करते हैं तो कल होने वाला बच्चा भी हाई रिस्क रहेगा । आईएमआर की समीक्षा में पाया गया कि अधिकांश शिशु मृत्यु के प्रकरण नियोनेटल पीरियड (0 से 28 दिन) के भीतर हो रहे हैं, जिनके प्रमुख कारण प्रिमैच्योरिटी (समय से पहले जन्म) , बर्थ एस्फिक्सिया हैं। प्रीमेच्योर प्रिजर्व रोकने के लिए हाई रिस्क प्रेग्नेंट महिला का गर्भावस्था के दौरान आवश्यक चिकित्सकीय प्रबंधन अति आवश्यक है। इसके साथ ही माता का उचित खानपान आवश्यक दवाओं का समय से सेवन और चारों एएनसी जांच भी अति महत्वपूर्ण है।
समीक्षा में निर्देश दिए गए कि हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की गर्भावस्था के दौरान दैनिक रूप से निगरानी रखी जाए साथ ही उन्हें आशा, सीएचओ, एएनएम के माध्यम से और जहां जरूरत हो वहां बीएमओ स्वयं जाकर आवश्यक मार्गदर्शन दें। इसके साथ ही उच्च जोखिम वाली गर्भवती माताओं की बर्थ मैपिंग कर उनकी संभावित प्रसव दिनांक के कम से कम 7 से 15 दिन पहले से उन्हें अस्पताल के बर्थ वेटिंग एरिया में स्थानांतरित किया जाए जिससे किसी भी आपातकालीन स्थिति से निपटने में मेडिकल टीम सक्षम रहे। उच्च जोखिम वाली महिलाओं को मैप किए गए अस्पताल की जानकारी न केवल स्वास्थ्य अमले को रहे बल्कि उनके परिवार को भी रहे। समीक्षा बैठक में निर्देश दिए गए कि मैटरनल डेथ रिव्यू (MDR) और चाइल्ड डेथ रिव्यू (CDR) की रिपोर्ट केवल औपचारिकता न रहे। फॉर्म 1 से 6 तक पूरी पारदर्शिता और गंभीरता से भरे जाएं। बीएमसी, डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल और सीएमएचओ की टीम एक साथ बैठकर संयुक्त ऑडिट करे ताकि गैप्स को खत्म किया जा सके।
ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर अपने क्षेत्र की आशा और एएनएम , आशा सुपरवाइजर, सीएचओ के कार्यों की निरंतर समीक्षा करें और आवश्यक कदम उठाएं। इसके साथ ही चिन्हांकन, डेटा एंट्री की सत्यता और समयबद्धता सुनिश्चित की जाए ।
कलेक्टर ने कहा कि प्रसव के बाद देखभाल भी एएनसी जितनी ही अनिवार्य है। आशा और एएनएम अनिवार्य रूप से प्रसूता के घर जाकर जच्चा-बच्चा का स्वास्थ्य परीक्षण करें। उनकी आवश्यक काउंसलिंग करें तथा उनके स्वास्थ्य का अपडेट रखें।
अनमोल 2.0 पर वास्तविक डेटा अपडेट हो। प्राइवेट अस्पतालों या गैर-सुविधाजनक केंद्रों में होने वाली असुरक्षित डिलीवरी पर कड़ी नजर रखी जाए। इसके साथ ही शिशु मृत्यु दर एवं बाल मृत्यु दर रोकने के लिए रूटीन इम्यूनाइजेशन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी समय सारणी के अनुसार सही समय पर शिशु का टीकाकरण हो जाए जिससे वह किसी भी गंभीर रोग या संक्रमण से ग्रसित ना होने पाए और सुरक्षित रहे।
कलेक्टर ने कहा कि ज़मीनी अमला और विशेषज्ञ मिलकर काम करें, तो हर जान बचाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि मातृत्व और शिशु स्वास्थ्य में सुधार के लिए केवल निर्देश देना काफी नहीं है, बल्कि निचले स्तर की आशा-एएनएम से लेकर विशेषज्ञ डॉक्टरों तक एक मजबूत समन्वय जरूरी है। स्वास्थ्य विभाग पूरी संवेदनशीलता के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाए, ताकि जिले में एक भी माँ या शिशु की असमय मृत्यु न हो पाए।
बैठक में जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी विवेक केवी, बीएमसी डीन डॉ पी एस ठाकुर, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ देवेश पटेरिया , सिविल सर्जन डॉ आर एस जयंत सहित बीएमसी, जिला चिकित्सालय तथा स्वास्थ्य विभाग के अन्य डॉक्टर अधिकारी कर्मचारी मौजूद थे।
बैठक की खासियत यह रही कि इसमें न केवल सीएमएचओ कार्यालय के जिला व ब्लॉक स्तरीय अधिकारी शामिल हुए, बल्कि जिला चिकित्सालय तथा बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ शिशु रोग विशेषज्ञ और एसएनसीयू इंचार्ज को भी एक मंच पर लाया गया।

कलेक्टर ने स्पष्ट किया कि इस संयुक्त मंथन का मुख्य उद्देश्य उन सटीक कारणों की पहचान करना है, जिनके चलते मरीज प्राथमिक / सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से रिफर होकर बीएमसी या जिला अस्पताल पहुँचते हैं और जो बाद में एमएमआर या आईएमआर में परिवर्तित हो जाते हैं। इन कारणों का विश्लेषण कर यह तय किया जा रहा है कि किस स्तर पर क्या चिकित्सीय एवं प्रशासनिक बदलाव आवश्यक हैं।
समीक्षा के दौरान एमएमआर या आईएमआर के मुख्य कारणों का विश्लेषण भी किया गया और बताया गया कि ज्यादातर प्रकरणों में माता में गंभीर एनीमिया की शिकायत तथा गर्भावस्था प्रेरित उच्च रक्तचाप की शिकायत होती है।
सर्वाधिक मामलों में मृत्यु की वजह पीआईएच (प्रेगनेंसी इंड्यूस्ड हाइपरटेंशन), हेपेटिक फेलियर, गंभीर एनीमिया तथा पोस्टपार्टम हैमरेज व एक्लेम्पसिया पाई गई।प्रीक्लेम्पसिया जिसमें (उच्च रक्तचाप और पेशाब में प्रोटीन) से पीड़ित महिला को अचानक दौरे पड़ने लगते हैं। ऐसे मामलों में समय पर मरीज को स्टेबल कर सही रिफरल प्रोटोकॉल का पालन किया जाए।
कलेक्टर ने निर्देश दिए कि जमीनी स्तर पर ही गर्भवती महिलाओं के नियमित बीपी और हीमोग्लोबिन की मॉनिटरिंग सुनिश्चित की जाए।
बैठक में डीन डॉ पी एस ठाकुर ने रेखांकित किया कि यदि माँ हाई-रिस्क गर्भवती है , तो उससे जन्म लेने वाला बच्चा भी हाई-रिस्क में ही आता है। एमएमआर और आईएमआर एक दूसरे से इसी प्रकार से संबंधित हैं। आज यदि हम हाई रिस्क माता का प्रबंधन नहीं करते हैं तो कल होने वाला बच्चा भी हाई रिस्क रहेगा । आईएमआर की समीक्षा में पाया गया कि अधिकांश शिशु मृत्यु के प्रकरण नियोनेटल पीरियड (0 से 28 दिन) के भीतर हो रहे हैं, जिनके प्रमुख कारण प्रिमैच्योरिटी (समय से पहले जन्म) , बर्थ एस्फिक्सिया हैं। प्रीमेच्योर प्रिजर्व रोकने के लिए हाई रिस्क प्रेग्नेंट महिला का गर्भावस्था के दौरान आवश्यक चिकित्सकीय प्रबंधन अति आवश्यक है। इसके साथ ही माता का उचित खानपान आवश्यक दवाओं का समय से सेवन और चारों एएनसी जांच भी अति महत्वपूर्ण है।
समीक्षा में निर्देश दिए गए कि हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की गर्भावस्था के दौरान दैनिक रूप से निगरानी रखी जाए साथ ही उन्हें आशा, सीएचओ, एएनएम के माध्यम से और जहां जरूरत हो वहां बीएमओ स्वयं जाकर आवश्यक मार्गदर्शन दें। इसके साथ ही उच्च जोखिम वाली गर्भवती माताओं की बर्थ मैपिंग कर उनकी संभावित प्रसव दिनांक के कम से कम 7 से 15 दिन पहले से उन्हें अस्पताल के बर्थ वेटिंग एरिया में स्थानांतरित किया जाए जिससे किसी भी आपातकालीन स्थिति से निपटने में मेडिकल टीम सक्षम रहे। उच्च जोखिम वाली महिलाओं को मैप किए गए अस्पताल की जानकारी न केवल स्वास्थ्य अमले को रहे बल्कि उनके परिवार को भी रहे। समीक्षा बैठक में निर्देश दिए गए कि मैटरनल डेथ रिव्यू (MDR) और चाइल्ड डेथ रिव्यू (CDR) की रिपोर्ट केवल औपचारिकता न रहे। फॉर्म 1 से 6 तक पूरी पारदर्शिता और गंभीरता से भरे जाएं। बीएमसी, डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल और सीएमएचओ की टीम एक साथ बैठकर संयुक्त ऑडिट करे ताकि गैप्स को खत्म किया जा सके।
ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर अपने क्षेत्र की आशा और एएनएम , आशा सुपरवाइजर, सीएचओ के कार्यों की निरंतर समीक्षा करें और आवश्यक कदम उठाएं। इसके साथ ही चिन्हांकन, डेटा एंट्री की सत्यता और समयबद्धता सुनिश्चित की जाए ।
कलेक्टर ने कहा कि प्रसव के बाद देखभाल भी एएनसी जितनी ही अनिवार्य है। आशा और एएनएम अनिवार्य रूप से प्रसूता के घर जाकर जच्चा-बच्चा का स्वास्थ्य परीक्षण करें। उनकी आवश्यक काउंसलिंग करें तथा उनके स्वास्थ्य का अपडेट रखें।
अनमोल 2.0 पर वास्तविक डेटा अपडेट हो। प्राइवेट अस्पतालों या गैर-सुविधाजनक केंद्रों में होने वाली असुरक्षित डिलीवरी पर कड़ी नजर रखी जाए। इसके साथ ही शिशु मृत्यु दर एवं बाल मृत्यु दर रोकने के लिए रूटीन इम्यूनाइजेशन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी समय सारणी के अनुसार सही समय पर शिशु का टीकाकरण हो जाए जिससे वह किसी भी गंभीर रोग या संक्रमण से ग्रसित ना होने पाए और सुरक्षित रहे।
कलेक्टर ने कहा कि ज़मीनी अमला और विशेषज्ञ मिलकर काम करें, तो हर जान बचाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि मातृत्व और शिशु स्वास्थ्य में सुधार के लिए केवल निर्देश देना काफी नहीं है, बल्कि निचले स्तर की आशा-एएनएम से लेकर विशेषज्ञ डॉक्टरों तक एक मजबूत समन्वय जरूरी है। स्वास्थ्य विभाग पूरी संवेदनशीलता के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाए, ताकि जिले में एक भी माँ या शिशु की असमय मृत्यु न हो पाए।
बैठक में जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी विवेक केवी, बीएमसी डीन डॉ पी एस ठाकुर, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ देवेश पटेरिया , सिविल सर्जन डॉ आर एस जयंत सहित बीएमसी, जिला चिकित्सालय तथा स्वास्थ्य विभाग के अन्य डॉक्टर अधिकारी कर्मचारी मौजूद थे।
