भोपाल। मध्य प्रदेश में मानसून की शुरुआत उम्मीदों के अनुरूप नहीं रही है। प्रदेश में अब तक सामान्य से 35 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है, जबकि पूर्वी मध्य प्रदेश में यह कमी 57 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इसी बीच दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों का ध्यान हजारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर पर केंद्रित हो गया है, जहां एक शक्तिशाली अल नीनो तेजी से विकसित होता दिखाई दे रहा है।
अमेरिका के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर (CPC) की 15 जून 2026 की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2026 के अंत तक अल नीनो के “वेरी स्ट्रॉन्ग” श्रेणी में पहुंचने की संभावना 63 प्रतिशत तक है। यदि ऐसा होता है तो इसका असर केवल अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या दक्षिण अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारतीय मानसून सहित दुनिया की जलवायु व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

*मध्य प्रदेश में बारिश का असमान वितरण*
भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार प्रदेश में अब तक औसतन 24.1 मिमी वर्षा हुई है, जबकि सामान्य वर्षा 37.2 मिमी होनी चाहिए थी। परिणामस्वरूप राज्य में 35 प्रतिशत वर्षा घाटा बना हुआ है।
सबसे अधिक चिंता पूर्वी मध्य प्रदेश की है, जहां केवल 15.9 मिमी बारिश दर्ज हुई है, जबकि सामान्य वर्षा 36.9 मिमी है। यहां वर्षा घाटा 57 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
बालाघाट (-84%), मंडला (-80%), टीकमगढ़ (-76%), मैहर (-70%), अनूपपुर और दमोह (-69%) सबसे अधिक प्रभावित जिलों में शामिल हैं। इसके विपरीत पश्चिमी मध्य प्रदेश की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। यहां वर्षा घाटा 19 प्रतिशत है। श्योपुर (+128%), नीमच (+111%), भोपाल (+106%), मुरैना (+89%) और अशोकनगर (+71%) में सामान्य से अधिक वर्षा दर्ज की गई है।
खातेगांव सबसे ज्यादा भीगा
16 जून को जारी मौसम केंद्र भोपाल की रिपोर्ट के अनुसार देवास जिले के खातेगांव में प्रदेश की सर्वाधिक 60 मिमी वर्षा दर्ज की गई।
इसके अलावा:
बरेली (रायसेन) – 28 मिमी
बैरसिया (भोपाल) – 26.4 मिमी
मुंगावली (अशोकनगर) – 24 मिमी
गोडाडोंगरी (बैतूल) – 20 मिमी
इछावर (सीहोर) – 20 मिमी
पूर्वी मध्य प्रदेश में तामिया (छिंदवाड़ा) 25 मिमी वर्षा के साथ सबसे आगे रहा।
*मानसून को मिल रहा मौसम प्रणालियों का सहारा*
हालांकि वर्षा घाटा बना हुआ है, लेकिन मौसम वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में स्थिति सुधर सकती है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून की उत्तरी सीमा वर्तमान में महाराष्ट्र, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड और बिहार के हिस्सों तक पहुंच चुकी है। अगले चार से पांच दिनों में मानसून के और आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां अनुकूल हैं।
देशभर में कई महत्वपूर्ण मौसम प्रणालियां सक्रिय है
पंजाब से बिहार तक मौसमी द्रोणिका
हरियाणा, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार-झारखंड और असम पर चक्रवाती परिसंचरण
पूर्वी उत्तर प्रदेश से तेलंगाना तक ट्रफ लाइन
बंगाल की खाड़ी से केरल तक ऊपरी वायुमंडलीय ट्रफ, इन प्रणालियों के कारण मध्य प्रदेश में वर्षा गतिविधियों के बढ़ने की संभावना बनी हुई है।
पचमढ़ी सबसे ठंडा, सतना की रात सबसे गर्म
बारिश और बादलों का असर तापमान पर भी दिखाई दिया।
प्रदेश का सबसे कम न्यूनतम तापमान पचमढ़ी में 18.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। भोपाल में न्यूनतम तापमान 21.6 डिग्री सेल्सियस रहा, जो सामान्य से 3.8 डिग्री कम है।
वहीं सतना में 29.8 डिग्री सेल्सियस, उमरिया में 29.1 डिग्री तथा खजुराहो में 29 डिग्री सेल्सियस न्यूनतम तापमान दर्ज किया गया। उमरिया में तापमान सामान्य से 5.5 डिग्री अधिक रहा।
*अब नजर प्रशांत महासागर पर क्यों?*
जब मध्य प्रदेश बारिश की कमी से जूझ रहा है, उसी समय वैज्ञानिकों की नजर प्रशांत महासागर में तेजी से विकसित हो रहे अल नीनो पर है।
अल नीनो एक महासागरीय-वायुमंडलीय घटना है जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। यह गर्मी वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित करती है और दुनिया भर में बारिश, सूखा, बाढ़ और तापमान के पैटर्न बदल देती है।
ताजा रिपोर्ट के अनुसार:
मध्य एवं पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्री सतह का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। समुद्र की गहराई में भी असामान्य रूप से गर्म जल मौजूद है।
व्यापारिक हवाओं (Trade Winds) में कमजोरी के संकेत मिल रहे हैं।
महासागर और वातावरण के बीच अल नीनो की प्रक्रिया लगातार मजबूत हो रही है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच इसके अत्यंत शक्तिशाली होने की संभावना 63 प्रतिशत है।
*दुनिया पर क्या होगा असर?*
इतिहास बताता है कि शक्तिशाली अल नीनो के दौरान दक्षिण अमेरिका में बाढ़ की घटनाएं बढ़ सकती हैं। ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में सूखा और जंगलों की आग बढ़ सकती है। अफ्रीका के कुछ हिस्सों में अत्यधिक वर्षा हो सकती है। उत्तरी अमेरिका में सर्दियों का स्वरूप बदल सकता है।
वैश्विक औसत तापमान नए रिकॉर्ड बना सकता है।
*भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?*
भारत की कृषि, जल संसाधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था काफी हद तक मानसून पर निर्भर हैं। इसलिए अल नीनो का हर संकेत भारतीय मौसम वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
हालांकि हर अल नीनो कमजोर मानसून का कारण नहीं बनता, लेकिन इतिहास में कई बार मजबूत अल नीनो के साथ सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई है। यदि 2026 के अंत तक अल नीनो और मजबूत होता है, तो वर्ष 2027 के मानसून पर इसके संभावित प्रभावों को लेकर चिंताएं बढ़ सकती हैं।
*जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चुनौती*
विशेषज्ञों का कहना है कि आज का अल नीनो पहले की तुलना में अधिक खतरनाक हो सकता है क्योंकि दुनिया पहले से ही ग्लोबल वार्मिंग के दौर से गुजर रही है।
जब मानवजनित जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक अल नीनो एक साथ सक्रिय होते हैं, तब
रिकॉर्ड तोड़ गर्मी,
लंबे सूखे,
अचानक बाढ़,
अत्यधिक वर्षा,
और चरम मौसम की घटनाओं का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
मध्य प्रदेश में फिलहाल मानसून की चाल सुस्त है, लेकिन सक्रिय मौसम प्रणालियां निकट भविष्य में राहत का संकेत दे रही हैं। दूसरी ओर प्रशांत महासागर में उभरता शक्तिशाली अल नीनो वैश्विक मौसम व्यवस्था के लिए बड़ा संकेत है। अगले छह से आठ महीने केवल मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के मौसम का भविष्य तय कर सकते हैं।
किसानों, जल प्रबंधन एजेंसियों और सरकारों के लिए यह समय सतर्क रहने का है। बदलती जलवायु के इस दौर में मौसम अब केवल पूर्वानुमान का विषय नहीं रह गया है, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और खाद्य सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन चुका है।
अमेरिका के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर (CPC) की 15 जून 2026 की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2026 के अंत तक अल नीनो के “वेरी स्ट्रॉन्ग” श्रेणी में पहुंचने की संभावना 63 प्रतिशत तक है। यदि ऐसा होता है तो इसका असर केवल अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या दक्षिण अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारतीय मानसून सहित दुनिया की जलवायु व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

*मध्य प्रदेश में बारिश का असमान वितरण*
भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार प्रदेश में अब तक औसतन 24.1 मिमी वर्षा हुई है, जबकि सामान्य वर्षा 37.2 मिमी होनी चाहिए थी। परिणामस्वरूप राज्य में 35 प्रतिशत वर्षा घाटा बना हुआ है।
सबसे अधिक चिंता पूर्वी मध्य प्रदेश की है, जहां केवल 15.9 मिमी बारिश दर्ज हुई है, जबकि सामान्य वर्षा 36.9 मिमी है। यहां वर्षा घाटा 57 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
बालाघाट (-84%), मंडला (-80%), टीकमगढ़ (-76%), मैहर (-70%), अनूपपुर और दमोह (-69%) सबसे अधिक प्रभावित जिलों में शामिल हैं। इसके विपरीत पश्चिमी मध्य प्रदेश की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। यहां वर्षा घाटा 19 प्रतिशत है। श्योपुर (+128%), नीमच (+111%), भोपाल (+106%), मुरैना (+89%) और अशोकनगर (+71%) में सामान्य से अधिक वर्षा दर्ज की गई है।
खातेगांव सबसे ज्यादा भीगा
16 जून को जारी मौसम केंद्र भोपाल की रिपोर्ट के अनुसार देवास जिले के खातेगांव में प्रदेश की सर्वाधिक 60 मिमी वर्षा दर्ज की गई।
इसके अलावा:
बरेली (रायसेन) – 28 मिमी
बैरसिया (भोपाल) – 26.4 मिमी
मुंगावली (अशोकनगर) – 24 मिमी
गोडाडोंगरी (बैतूल) – 20 मिमी
इछावर (सीहोर) – 20 मिमी
पूर्वी मध्य प्रदेश में तामिया (छिंदवाड़ा) 25 मिमी वर्षा के साथ सबसे आगे रहा।
*मानसून को मिल रहा मौसम प्रणालियों का सहारा*
हालांकि वर्षा घाटा बना हुआ है, लेकिन मौसम वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में स्थिति सुधर सकती है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून की उत्तरी सीमा वर्तमान में महाराष्ट्र, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड और बिहार के हिस्सों तक पहुंच चुकी है। अगले चार से पांच दिनों में मानसून के और आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां अनुकूल हैं।
देशभर में कई महत्वपूर्ण मौसम प्रणालियां सक्रिय है
पंजाब से बिहार तक मौसमी द्रोणिका
हरियाणा, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार-झारखंड और असम पर चक्रवाती परिसंचरण
पूर्वी उत्तर प्रदेश से तेलंगाना तक ट्रफ लाइन
बंगाल की खाड़ी से केरल तक ऊपरी वायुमंडलीय ट्रफ, इन प्रणालियों के कारण मध्य प्रदेश में वर्षा गतिविधियों के बढ़ने की संभावना बनी हुई है।
पचमढ़ी सबसे ठंडा, सतना की रात सबसे गर्म
बारिश और बादलों का असर तापमान पर भी दिखाई दिया।
प्रदेश का सबसे कम न्यूनतम तापमान पचमढ़ी में 18.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। भोपाल में न्यूनतम तापमान 21.6 डिग्री सेल्सियस रहा, जो सामान्य से 3.8 डिग्री कम है।
वहीं सतना में 29.8 डिग्री सेल्सियस, उमरिया में 29.1 डिग्री तथा खजुराहो में 29 डिग्री सेल्सियस न्यूनतम तापमान दर्ज किया गया। उमरिया में तापमान सामान्य से 5.5 डिग्री अधिक रहा।
*अब नजर प्रशांत महासागर पर क्यों?*
जब मध्य प्रदेश बारिश की कमी से जूझ रहा है, उसी समय वैज्ञानिकों की नजर प्रशांत महासागर में तेजी से विकसित हो रहे अल नीनो पर है।
अल नीनो एक महासागरीय-वायुमंडलीय घटना है जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। यह गर्मी वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित करती है और दुनिया भर में बारिश, सूखा, बाढ़ और तापमान के पैटर्न बदल देती है।
ताजा रिपोर्ट के अनुसार:
मध्य एवं पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्री सतह का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। समुद्र की गहराई में भी असामान्य रूप से गर्म जल मौजूद है।
व्यापारिक हवाओं (Trade Winds) में कमजोरी के संकेत मिल रहे हैं।
महासागर और वातावरण के बीच अल नीनो की प्रक्रिया लगातार मजबूत हो रही है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच इसके अत्यंत शक्तिशाली होने की संभावना 63 प्रतिशत है।
*दुनिया पर क्या होगा असर?*
इतिहास बताता है कि शक्तिशाली अल नीनो के दौरान दक्षिण अमेरिका में बाढ़ की घटनाएं बढ़ सकती हैं। ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में सूखा और जंगलों की आग बढ़ सकती है। अफ्रीका के कुछ हिस्सों में अत्यधिक वर्षा हो सकती है। उत्तरी अमेरिका में सर्दियों का स्वरूप बदल सकता है।
वैश्विक औसत तापमान नए रिकॉर्ड बना सकता है।
*भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?*
भारत की कृषि, जल संसाधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था काफी हद तक मानसून पर निर्भर हैं। इसलिए अल नीनो का हर संकेत भारतीय मौसम वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
हालांकि हर अल नीनो कमजोर मानसून का कारण नहीं बनता, लेकिन इतिहास में कई बार मजबूत अल नीनो के साथ सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई है। यदि 2026 के अंत तक अल नीनो और मजबूत होता है, तो वर्ष 2027 के मानसून पर इसके संभावित प्रभावों को लेकर चिंताएं बढ़ सकती हैं।
*जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चुनौती*
विशेषज्ञों का कहना है कि आज का अल नीनो पहले की तुलना में अधिक खतरनाक हो सकता है क्योंकि दुनिया पहले से ही ग्लोबल वार्मिंग के दौर से गुजर रही है।
जब मानवजनित जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक अल नीनो एक साथ सक्रिय होते हैं, तब
रिकॉर्ड तोड़ गर्मी,
लंबे सूखे,
अचानक बाढ़,
अत्यधिक वर्षा,
और चरम मौसम की घटनाओं का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
मध्य प्रदेश में फिलहाल मानसून की चाल सुस्त है, लेकिन सक्रिय मौसम प्रणालियां निकट भविष्य में राहत का संकेत दे रही हैं। दूसरी ओर प्रशांत महासागर में उभरता शक्तिशाली अल नीनो वैश्विक मौसम व्यवस्था के लिए बड़ा संकेत है। अगले छह से आठ महीने केवल मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के मौसम का भविष्य तय कर सकते हैं।
किसानों, जल प्रबंधन एजेंसियों और सरकारों के लिए यह समय सतर्क रहने का है। बदलती जलवायु के इस दौर में मौसम अब केवल पूर्वानुमान का विषय नहीं रह गया है, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और खाद्य सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन चुका है।
