सागर। पूर्व गृहमंत्री एवं विधायक भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होने वाला हिंदू नववर्ष भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि भारत केवल एक राजनीतिक राष्ट्र नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक राष्ट्र है, जिसकी पहचान उसकी प्राचीन कालगणना, परंपराओं और जीवन मूल्यों में निहित है।

उन्होंने कहा कि विक्रम संवत 2082 का प्रारंभ भारतीय सभ्यता की उस ज्ञान परंपरा का स्मरण कराता है, जिसमें प्रकृति, खगोल विज्ञान और गणित के आधार पर समय की गणना की जाती रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय पुराणों के अनुसार इसी दिन सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी और इसी तिथि से सतयुग का प्रारंभ माना गया है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक, धर्मराज युधिष्ठिर के राज्यारोहण सहित अनेक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रसंग इस दिन से जुड़े हुए हैं। इसलिए चैत्र शुक्ल प्रतिपदा केवल कालगणना की शुरुआत नहीं बल्कि धर्म, नीति और आदर्श शासन व्यवस्था के प्रतीक रामराज्य की स्मृति का भी प्रतीक है।
श्री सिंह ने कहा कि हिंदू नववर्ष का प्रारंभ उस समय होता है जब प्रकृति स्वयं नवजीवन का संदेश देती है। बसंत ऋतु के आगमन के साथ धरती नया श्रृंगार करती है, वृक्षों में नई कोपलें फूटती हैं, खेतों में नई फसलें आती हैं और वातावरण में नई ऊर्जा का संचार होता है। प्रकृति का यह परिवर्तन भारतीय समाज को भी नवसंकल्प और नवचेतना की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही चैत्र नवरात्रि का शुभारंभ होता है, जो नौ दिनों तक चलने वाला शक्ति साधना का महापर्व है। इन दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में नवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आत्मशक्ति, संयम और साधना का प्रतीक है, जो मनुष्य को अपने भीतर की शक्ति को जागृत करने और अधर्म तथा अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस प्रदान करता है। श्री सिंह ने कहा कि देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध केवल एक पौराणिक कथा नहीं बल्कि बुराई पर अच्छाई की विजय का शाश्वत प्रतीक है। यही कारण है कि भारतीय समाज में नवरात्रि को आत्मशुद्धि, अनुशासन और आध्यात्मिक ऊर्जा के जागरण का पर्व माना जाता है। उपवास, साधना, जप और पूजा के माध्यम से व्यक्ति अपने मन, शरीर और आत्मा को शुद्ध करने का प्रयास करता है और यही कारण है कि हिंदू नववर्ष का प्रारंभ नवरात्रि जैसे आध्यात्मिक पर्व से होता है। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विविधता इस पर्व के माध्यम से स्पष्ट दिखाई देती है। महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में उगादि, सिंधी समाज में चेटीचंड, कश्मीर में नवरेह और मणिपुर में सजिबु नोंगमा पानबा के रूप में यह उत्सव मनाया जाता है। अलग-अलग भाषाओं और परंपराओं के बावजूद इस पर्व की मूल भावना एक ही है—भारतीय संस्कृति के प्रति गौरव और समाज में नई ऊर्जा का संचार। श्री सिंह ने कहा कि भारतीय कालगणना की वैज्ञानिकता भी उल्लेखनीय है। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही दिन, मास और वर्ष की गणना का आधार माना था। भारतीय पंचांग सूर्य और चंद्रमा दोनों की गति के आधार पर तैयार किया गया है, इसलिए यह प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करता है। उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास बताता है कि अनेक विदेशी आक्रमणों और औपनिवेशिक शासन के बावजूद भारतीय समाज ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को कभी समाप्त नहीं होने दिया। मुग़ल काल से लेकर अंग्रेजी शासन तक अनेक प्रयास किए गए कि भारतीय समाज अपनी परंपराओं और संस्कृति को भूल जाए, लेकिन भारतीय समाज ने अपने त्योहारों और परंपराओं के माध्यम से अपनी पहचान को सुरक्षित रखा। श्री सिंह ने कहा कि औपनिवेशिक शासन के दौरान पश्चिमी जीवन शैली और कालगणना को श्रेष्ठ बताने का प्रयास किया गया, जिसके कारण समाज का एक बड़ा वर्ग एक जनवरी को ही नववर्ष मानने लगा। जबकि भारतीय परंपरा में वास्तविक नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही आरंभ होता है और यह स्थिति हमें अपनी सांस्कृतिक चेतना को और अधिक सशक्त करने की आवश्यकता का संदेश देती है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने समाज में भारतीयता के भाव को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने भारतीय समाज को संगठित करने और सांस्कृतिक चेतना को जागृत करने का जो कार्य प्रारंभ किया, वह आज भी करोड़ों स्वयंसेवकों के माध्यम से समाज जीवन में दिखाई देता है।
श्री सिंह ने कहा कि संघ की विचारधारा का मूल आधार यही है कि राष्ट्र की शक्ति समाज की एकता और सांस्कृतिक चेतना में निहित होती है। यदि समाज अपनी संस्कृति, परंपरा और इतिहास के प्रति गौरव का भाव रखेगा तो राष्ट्र स्वाभाविक रूप से सशक्त बनेगा। संघ के स्वयंसेवक वर्ष प्रतिपदा को केवल नववर्ष के रूप में नहीं बल्कि राष्ट्रीय जागरण के प्रतीक के रूप में देखते हैं।
उन्होंने कहा कि हिंदू नववर्ष हमें केवल परंपराओं का स्मरण ही नहीं कराता बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का भी बोध कराता है। हमें अपने जीवन में स्वास्थ्य, अनुशासन और संयम को स्थान देना चाहिए, क्योंकि स्वस्थ नागरिक ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।
श्री सिंह ने कहा कि भारतीय समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी पारिवारिक व्यवस्था है। परिवार केवल एक सामाजिक संस्था नहीं बल्कि संस्कारों की पाठशाला है, जहां बच्चों को संस्कृति, नैतिकता और कर्तव्यबोध की शिक्षा मिलती है।
उन्होंने कहा कि महिलाओं के सम्मान और सशक्तिकरण का विचार भी भारतीय संस्कृति की मूल भावना में शामिल है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है—“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:”, अर्थात जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवताओं का वास होता है।
श्री सिंह ने कहा कि भारतीय संस्कृति सदैव प्रकृति को माता के रूप में पूजती रही है। जल, वायु, पृथ्वी और वनस्पति के प्रति सम्मान का भाव हमारे जीवन दर्शन का हिस्सा है और आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब भारतीय जीवन शैली और संस्कृति का यह दृष्टिकोण मानवता के लिए मार्गदर्शक बन सकता है।
उन्होंने कहा कि नव संवत्सर का यह पावन अवसर हमें यह स्मरण कराता है कि भारतीय संस्कृति केवल अतीत की स्मृति नहीं बल्कि भविष्य की दिशा भी है। यह संस्कृति त्याग, समरसता और सर्वजन हिताय के सिद्धांतों पर आधारित है तथा “वसुधैव कुटुंबकम” का विचार पूरी मानवता को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देता है।
श्री सिंह ने कहा कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का यह पावन पर्व हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने जीवन में नवसंकल्प लें, समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करें और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएं। नव संवत्सर के इस शुभ अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय स्वाभिमान को सशक्त बनाने में अपनी भूमिका निभाएंगे।

उन्होंने कहा कि विक्रम संवत 2082 का प्रारंभ भारतीय सभ्यता की उस ज्ञान परंपरा का स्मरण कराता है, जिसमें प्रकृति, खगोल विज्ञान और गणित के आधार पर समय की गणना की जाती रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय पुराणों के अनुसार इसी दिन सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी और इसी तिथि से सतयुग का प्रारंभ माना गया है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक, धर्मराज युधिष्ठिर के राज्यारोहण सहित अनेक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रसंग इस दिन से जुड़े हुए हैं। इसलिए चैत्र शुक्ल प्रतिपदा केवल कालगणना की शुरुआत नहीं बल्कि धर्म, नीति और आदर्श शासन व्यवस्था के प्रतीक रामराज्य की स्मृति का भी प्रतीक है।
श्री सिंह ने कहा कि हिंदू नववर्ष का प्रारंभ उस समय होता है जब प्रकृति स्वयं नवजीवन का संदेश देती है। बसंत ऋतु के आगमन के साथ धरती नया श्रृंगार करती है, वृक्षों में नई कोपलें फूटती हैं, खेतों में नई फसलें आती हैं और वातावरण में नई ऊर्जा का संचार होता है। प्रकृति का यह परिवर्तन भारतीय समाज को भी नवसंकल्प और नवचेतना की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही चैत्र नवरात्रि का शुभारंभ होता है, जो नौ दिनों तक चलने वाला शक्ति साधना का महापर्व है। इन दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में नवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आत्मशक्ति, संयम और साधना का प्रतीक है, जो मनुष्य को अपने भीतर की शक्ति को जागृत करने और अधर्म तथा अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस प्रदान करता है। श्री सिंह ने कहा कि देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध केवल एक पौराणिक कथा नहीं बल्कि बुराई पर अच्छाई की विजय का शाश्वत प्रतीक है। यही कारण है कि भारतीय समाज में नवरात्रि को आत्मशुद्धि, अनुशासन और आध्यात्मिक ऊर्जा के जागरण का पर्व माना जाता है। उपवास, साधना, जप और पूजा के माध्यम से व्यक्ति अपने मन, शरीर और आत्मा को शुद्ध करने का प्रयास करता है और यही कारण है कि हिंदू नववर्ष का प्रारंभ नवरात्रि जैसे आध्यात्मिक पर्व से होता है। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विविधता इस पर्व के माध्यम से स्पष्ट दिखाई देती है। महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में उगादि, सिंधी समाज में चेटीचंड, कश्मीर में नवरेह और मणिपुर में सजिबु नोंगमा पानबा के रूप में यह उत्सव मनाया जाता है। अलग-अलग भाषाओं और परंपराओं के बावजूद इस पर्व की मूल भावना एक ही है—भारतीय संस्कृति के प्रति गौरव और समाज में नई ऊर्जा का संचार। श्री सिंह ने कहा कि भारतीय कालगणना की वैज्ञानिकता भी उल्लेखनीय है। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही दिन, मास और वर्ष की गणना का आधार माना था। भारतीय पंचांग सूर्य और चंद्रमा दोनों की गति के आधार पर तैयार किया गया है, इसलिए यह प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करता है। उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास बताता है कि अनेक विदेशी आक्रमणों और औपनिवेशिक शासन के बावजूद भारतीय समाज ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को कभी समाप्त नहीं होने दिया। मुग़ल काल से लेकर अंग्रेजी शासन तक अनेक प्रयास किए गए कि भारतीय समाज अपनी परंपराओं और संस्कृति को भूल जाए, लेकिन भारतीय समाज ने अपने त्योहारों और परंपराओं के माध्यम से अपनी पहचान को सुरक्षित रखा। श्री सिंह ने कहा कि औपनिवेशिक शासन के दौरान पश्चिमी जीवन शैली और कालगणना को श्रेष्ठ बताने का प्रयास किया गया, जिसके कारण समाज का एक बड़ा वर्ग एक जनवरी को ही नववर्ष मानने लगा। जबकि भारतीय परंपरा में वास्तविक नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही आरंभ होता है और यह स्थिति हमें अपनी सांस्कृतिक चेतना को और अधिक सशक्त करने की आवश्यकता का संदेश देती है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने समाज में भारतीयता के भाव को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने भारतीय समाज को संगठित करने और सांस्कृतिक चेतना को जागृत करने का जो कार्य प्रारंभ किया, वह आज भी करोड़ों स्वयंसेवकों के माध्यम से समाज जीवन में दिखाई देता है।
श्री सिंह ने कहा कि संघ की विचारधारा का मूल आधार यही है कि राष्ट्र की शक्ति समाज की एकता और सांस्कृतिक चेतना में निहित होती है। यदि समाज अपनी संस्कृति, परंपरा और इतिहास के प्रति गौरव का भाव रखेगा तो राष्ट्र स्वाभाविक रूप से सशक्त बनेगा। संघ के स्वयंसेवक वर्ष प्रतिपदा को केवल नववर्ष के रूप में नहीं बल्कि राष्ट्रीय जागरण के प्रतीक के रूप में देखते हैं।
उन्होंने कहा कि हिंदू नववर्ष हमें केवल परंपराओं का स्मरण ही नहीं कराता बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का भी बोध कराता है। हमें अपने जीवन में स्वास्थ्य, अनुशासन और संयम को स्थान देना चाहिए, क्योंकि स्वस्थ नागरिक ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।
श्री सिंह ने कहा कि भारतीय समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी पारिवारिक व्यवस्था है। परिवार केवल एक सामाजिक संस्था नहीं बल्कि संस्कारों की पाठशाला है, जहां बच्चों को संस्कृति, नैतिकता और कर्तव्यबोध की शिक्षा मिलती है।
उन्होंने कहा कि महिलाओं के सम्मान और सशक्तिकरण का विचार भी भारतीय संस्कृति की मूल भावना में शामिल है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है—“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:”, अर्थात जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवताओं का वास होता है।
श्री सिंह ने कहा कि भारतीय संस्कृति सदैव प्रकृति को माता के रूप में पूजती रही है। जल, वायु, पृथ्वी और वनस्पति के प्रति सम्मान का भाव हमारे जीवन दर्शन का हिस्सा है और आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब भारतीय जीवन शैली और संस्कृति का यह दृष्टिकोण मानवता के लिए मार्गदर्शक बन सकता है।
उन्होंने कहा कि नव संवत्सर का यह पावन अवसर हमें यह स्मरण कराता है कि भारतीय संस्कृति केवल अतीत की स्मृति नहीं बल्कि भविष्य की दिशा भी है। यह संस्कृति त्याग, समरसता और सर्वजन हिताय के सिद्धांतों पर आधारित है तथा “वसुधैव कुटुंबकम” का विचार पूरी मानवता को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देता है।
श्री सिंह ने कहा कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का यह पावन पर्व हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने जीवन में नवसंकल्प लें, समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करें और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएं। नव संवत्सर के इस शुभ अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय स्वाभिमान को सशक्त बनाने में अपनी भूमिका निभाएंगे।
