सागर। शासकीय स्वशासी कन्या स्नातकोत्तर उत्कृष्टता महाविद्यालय में समाज शास्त्र विभाग द्वारा “सामाजिक अनुसंधान” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि विधायक शैलेन्द्र जैन ने कहा कि राजनीति को सामाजिक क्षेत्र से अलग नहीं देखा जाना चाहिए। राजनीति की सफलता के पीछे सामाजिक अनुसंधान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

श्री जैन ने कहा कि लाड़ली लक्ष्मी योजना सामाजिक अनुसंधान का प्रत्यक्ष परिणाम है। वर्ष 2001 की जनगणना में लिंगानुपात प्रति 1000 पुरुषों पर 919 महिलाओं का था, जो सामाजिक असंतुलन को दर्शाता था। इस दिशा में लाड़ली लक्ष्मी योजना जैसे प्रयासों से सकारात्मक परिवर्तन आया और 2011 में यह आंकड़ा 934 हुआ, जो 2023 तक बढ़कर लगभग 942 तक पहुंच गया। उन्होंने कहा कि ऐसी शोध संगोष्ठियां विचार-मंथन और सामाजिक परिवर्तन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।प्रमुख वक्ता डॉ. प्रमोद गुप्ता (लखनऊ विश्वविद्यालय) ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में अनेक शोध योग्य विषय हैं, जिनका संवर्धन करते हुए नवीन शोध पद्धतियों को जोड़ना आवश्यक है।
विषय विशेषज्ञ डॉ. दिवाकर सिंह राजपूत ने कहा कि सामाजिक, सांस्कृतिक और तार्किक आयामों पर आधारित शोध समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकते हैं।
महाविद्यालय जनभागीदारी अध्यक्ष श्रीमती मनीषा मिश्रा ने सामाजिक अनुसंधान को समाज का दर्पण बताया।
डॉ. महेश शुक्ला ने कहा कि जिज्ञासा ही शोध का मूल है, वहीं डॉ. श्रीकांत पाण्डेय (पूर्व आईएएस) ने कहा कि शोध तथ्यों का संग्रह नहीं, बल्कि बौद्धिक समृद्धि का माध्यम है।
अध्यक्षीय उद्बोधन डॉ. नीरज दुबे, अतिरिक्त संचालक, उच्च शिक्षा सागर संभाग ने कहा कि शोध व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक लाभ के लिए होना चाहिए और अनुसंधान को समाज परिवर्तन का सशक्त माध्यम बनाया जा सकता है। शोध पत्रों का प्रकाशन संगोष्ठी में प्राप्त 150 शोध पत्रों में से 76 शोध पत्रों का प्रकाशन दो खंडों में किया गया। प्रथम खंड में 42 हिंदी एवं द्वितीय खंड में 34 अंग्रेजी शोध पत्र शामिल हैं। दोनों शोध ग्रंथों का विमोचन मंचासीन अतिथियों द्वारा किया गया। उद्घाटन सत्र के पश्चात तीन तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के विषय विशेषज्ञों द्वारा शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।
स्वागत उद्बोधन डॉ. आनंद तिवारी (प्राचार्य) द्वारा दिया गया। कार्यक्रम की रूपरेखा डॉ. रश्मि दुबे (समन्वयक संगोष्ठी) ने प्रस्तुत की। संचालन डॉ. अंजना चतुर्वेदी ने किया तथा आभार प्रदर्शन डॉ. संजय खरे (आयोजन सचिव) द्वारा किया गया।

श्री जैन ने कहा कि लाड़ली लक्ष्मी योजना सामाजिक अनुसंधान का प्रत्यक्ष परिणाम है। वर्ष 2001 की जनगणना में लिंगानुपात प्रति 1000 पुरुषों पर 919 महिलाओं का था, जो सामाजिक असंतुलन को दर्शाता था। इस दिशा में लाड़ली लक्ष्मी योजना जैसे प्रयासों से सकारात्मक परिवर्तन आया और 2011 में यह आंकड़ा 934 हुआ, जो 2023 तक बढ़कर लगभग 942 तक पहुंच गया। उन्होंने कहा कि ऐसी शोध संगोष्ठियां विचार-मंथन और सामाजिक परिवर्तन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।प्रमुख वक्ता डॉ. प्रमोद गुप्ता (लखनऊ विश्वविद्यालय) ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में अनेक शोध योग्य विषय हैं, जिनका संवर्धन करते हुए नवीन शोध पद्धतियों को जोड़ना आवश्यक है।
विषय विशेषज्ञ डॉ. दिवाकर सिंह राजपूत ने कहा कि सामाजिक, सांस्कृतिक और तार्किक आयामों पर आधारित शोध समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकते हैं।
महाविद्यालय जनभागीदारी अध्यक्ष श्रीमती मनीषा मिश्रा ने सामाजिक अनुसंधान को समाज का दर्पण बताया।
डॉ. महेश शुक्ला ने कहा कि जिज्ञासा ही शोध का मूल है, वहीं डॉ. श्रीकांत पाण्डेय (पूर्व आईएएस) ने कहा कि शोध तथ्यों का संग्रह नहीं, बल्कि बौद्धिक समृद्धि का माध्यम है।
अध्यक्षीय उद्बोधन डॉ. नीरज दुबे, अतिरिक्त संचालक, उच्च शिक्षा सागर संभाग ने कहा कि शोध व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक लाभ के लिए होना चाहिए और अनुसंधान को समाज परिवर्तन का सशक्त माध्यम बनाया जा सकता है। शोध पत्रों का प्रकाशन संगोष्ठी में प्राप्त 150 शोध पत्रों में से 76 शोध पत्रों का प्रकाशन दो खंडों में किया गया। प्रथम खंड में 42 हिंदी एवं द्वितीय खंड में 34 अंग्रेजी शोध पत्र शामिल हैं। दोनों शोध ग्रंथों का विमोचन मंचासीन अतिथियों द्वारा किया गया। उद्घाटन सत्र के पश्चात तीन तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के विषय विशेषज्ञों द्वारा शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।
स्वागत उद्बोधन डॉ. आनंद तिवारी (प्राचार्य) द्वारा दिया गया। कार्यक्रम की रूपरेखा डॉ. रश्मि दुबे (समन्वयक संगोष्ठी) ने प्रस्तुत की। संचालन डॉ. अंजना चतुर्वेदी ने किया तथा आभार प्रदर्शन डॉ. संजय खरे (आयोजन सचिव) द्वारा किया गया।
