सागर । चुनावी व्यवस्था पर सवाल उठाने वाली कांग्रेस को पहले अपने इतिहास और लोकतांत्रिक आचरण से जुड़े सवालों का जवाब देना चाहिए। वर्ष 1975 का आपातकाल, प्रेस पर सेंसरशिप और विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियाँ भारतीय लोकतंत्र के ऐसे अध्याय हैं, जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता।

अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल से राज्य सरकारों की बर्खास्तगी भी देश के लोकतांत्रिक इतिहास का एक गंभीर विषय रही है। वर्ष 1984 की सिख-विरोधी हिंसा और शाह बानो प्रकरण भी कांग्रेस की राजनीतिक विरासत तथा जवाबदेही पर बहस के विषय हैं। आज जब कांग्रेस निर्वाचन आयोग, ईवीएम और मतदाता सूची की प्रक्रिया पर सवाल उठाती है, तब यह पूछना स्वाभाविक है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता और जनादेश के सम्मान को लेकर उसके अपने राजनीतिक इतिहास का आकलन किस आधार पर किया जाना चाहिए? भाजपा की ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ मुहिम इसी व्यापक बहस को सामने रखती है कि चुनावी प्रक्रिया पर आरोप लगाने के साथ-साथ हर राजनीतिक दल को अपने दावों के समर्थन में प्रमाण देने और अपने अतीत से जुड़े सवालों का जवाब देने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
राहुल गांधी द्वारा विदेशी मंचों पर भारत के लोकतंत्र और संस्थाओं को लेकर उठाए गए सवालों पर भी बहस होनी चाहिए। लोकतंत्र में आलोचना करना अधिकार है, लेकिन गंभीर आरोपों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करना भी जरूरी है। इसी तरह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दिवंगत माता पिता के प्रति कथित अपमानजनक टिप्पणियों की राजनीतिक भाषा के स्तर पर आलोचना होनी चाहिए। सार्वजनिक जीवन में असहमति का स्थान है, व्यक्तिगत अपमान का नहीं।
अवैध घुसपैठ राष्ट्रीय सुरक्षा, नागरिकता और मतदाता सूची की शुद्धता से जुड़ा गंभीर विषय है। इसकी रोकथाम कानून के अनुसार होनी चाहिए और किसी पात्र नागरिक का मताधिकार सुरक्षित रहना चाहिए। किसी भी दल पर घुसपैठियों को राजनीतिक संरक्षण देने का आरोप हो, तो उसे प्रमाणों के आधार पर परखा जाना चाहिए। इसी प्रकार, सरकार को अस्थिर करने में विदेशी एजेंसियों की भूमिका जैसे गंभीर दावों को भी विश्वसनीय साक्ष्यों के बिना तथ्य नहीं माना जा सकता। विपक्ष द्वारा चुनावी गड़बड़ियों और कथित ‘वोट चोरी’ के आरोपों को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात का प्रसंग भी राजनीतिक जवाबदेही के सवाल को सामने लाता है। 9 अक्टूबर 2026 को विपक्षी दलों के प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा। मुलाकात के बाद राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने मीडिया को बताया कि राष्ट्रपति ने उनके आरोपों के समर्थन में प्रमाण माँगे हैं और विपक्ष प्रमाण उपलब्ध कराएगा। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न है कि जब आरोप इतने गंभीर हैं, तो उनके समर्थन में प्रस्तुत किए जाने वाले प्रमाण सार्वजनिक बहस और संबंधित संवैधानिक संस्थाओं के सामने कब रखे जाएंगे? लोकतंत्र में आरोप लगाना राजनीतिक अधिकार है, लेकिन उनकी विश्वसनीयता प्रमाणों से ही स्थापित होती है। इसलिए इन आरोपों की जाँच भी तथ्यों और निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के आधार पर होनी चाहिए।
मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर चुनावी व्यवस्था को दुरुस्त करने की प्रक्रिया है। मृत और स्थानांतरित मतदाताओं की प्रविष्टियों की जाँच, दोहरे पंजीकरण में सुधार तथा पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखना निष्पक्ष चुनाव के लिए आवश्यक है। कांग्रेस और विपक्ष को एसआईआर पर आपत्ति है, तो उन्हें ठोस प्रमाणों के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। सवाल यह भी है कि कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकारें बनीं, तब निर्वाचन आयोग और चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर आज जैसे सवाल क्यों नहीं उठे? हालांकि, अलग-अलग राज्यों और चुनावों की परिस्थितियों का मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर ही होना चाहिए। किसी पात्र नागरिक का नाम नहीं कटना चाहिए, लेकिन मतदाता सूची की त्रुटियों को दूर करने का विरोध भी बिना ठोस कारणों के उचित नहीं है।
लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों जवाबदेह हैं। ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ का मूल प्रश्न यही है—राजनीतिक संघर्ष संविधान के दायरे में होगा या आरोपों और अविश्वास के सहारे? चुनावी शुचिता, पात्र मतदाता के अधिकार, राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र की ताकत नारों में नहीं, निष्पक्ष प्रक्रिया, प्रमाण-आधारित बहस और जनता के जनादेश के सम्मान में निहित है।

अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल से राज्य सरकारों की बर्खास्तगी भी देश के लोकतांत्रिक इतिहास का एक गंभीर विषय रही है। वर्ष 1984 की सिख-विरोधी हिंसा और शाह बानो प्रकरण भी कांग्रेस की राजनीतिक विरासत तथा जवाबदेही पर बहस के विषय हैं। आज जब कांग्रेस निर्वाचन आयोग, ईवीएम और मतदाता सूची की प्रक्रिया पर सवाल उठाती है, तब यह पूछना स्वाभाविक है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता और जनादेश के सम्मान को लेकर उसके अपने राजनीतिक इतिहास का आकलन किस आधार पर किया जाना चाहिए? भाजपा की ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ मुहिम इसी व्यापक बहस को सामने रखती है कि चुनावी प्रक्रिया पर आरोप लगाने के साथ-साथ हर राजनीतिक दल को अपने दावों के समर्थन में प्रमाण देने और अपने अतीत से जुड़े सवालों का जवाब देने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
राहुल गांधी द्वारा विदेशी मंचों पर भारत के लोकतंत्र और संस्थाओं को लेकर उठाए गए सवालों पर भी बहस होनी चाहिए। लोकतंत्र में आलोचना करना अधिकार है, लेकिन गंभीर आरोपों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करना भी जरूरी है। इसी तरह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दिवंगत माता पिता के प्रति कथित अपमानजनक टिप्पणियों की राजनीतिक भाषा के स्तर पर आलोचना होनी चाहिए। सार्वजनिक जीवन में असहमति का स्थान है, व्यक्तिगत अपमान का नहीं।
अवैध घुसपैठ राष्ट्रीय सुरक्षा, नागरिकता और मतदाता सूची की शुद्धता से जुड़ा गंभीर विषय है। इसकी रोकथाम कानून के अनुसार होनी चाहिए और किसी पात्र नागरिक का मताधिकार सुरक्षित रहना चाहिए। किसी भी दल पर घुसपैठियों को राजनीतिक संरक्षण देने का आरोप हो, तो उसे प्रमाणों के आधार पर परखा जाना चाहिए। इसी प्रकार, सरकार को अस्थिर करने में विदेशी एजेंसियों की भूमिका जैसे गंभीर दावों को भी विश्वसनीय साक्ष्यों के बिना तथ्य नहीं माना जा सकता। विपक्ष द्वारा चुनावी गड़बड़ियों और कथित ‘वोट चोरी’ के आरोपों को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात का प्रसंग भी राजनीतिक जवाबदेही के सवाल को सामने लाता है। 9 अक्टूबर 2026 को विपक्षी दलों के प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा। मुलाकात के बाद राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने मीडिया को बताया कि राष्ट्रपति ने उनके आरोपों के समर्थन में प्रमाण माँगे हैं और विपक्ष प्रमाण उपलब्ध कराएगा। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न है कि जब आरोप इतने गंभीर हैं, तो उनके समर्थन में प्रस्तुत किए जाने वाले प्रमाण सार्वजनिक बहस और संबंधित संवैधानिक संस्थाओं के सामने कब रखे जाएंगे? लोकतंत्र में आरोप लगाना राजनीतिक अधिकार है, लेकिन उनकी विश्वसनीयता प्रमाणों से ही स्थापित होती है। इसलिए इन आरोपों की जाँच भी तथ्यों और निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के आधार पर होनी चाहिए।
मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर चुनावी व्यवस्था को दुरुस्त करने की प्रक्रिया है। मृत और स्थानांतरित मतदाताओं की प्रविष्टियों की जाँच, दोहरे पंजीकरण में सुधार तथा पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखना निष्पक्ष चुनाव के लिए आवश्यक है। कांग्रेस और विपक्ष को एसआईआर पर आपत्ति है, तो उन्हें ठोस प्रमाणों के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। सवाल यह भी है कि कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकारें बनीं, तब निर्वाचन आयोग और चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर आज जैसे सवाल क्यों नहीं उठे? हालांकि, अलग-अलग राज्यों और चुनावों की परिस्थितियों का मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर ही होना चाहिए। किसी पात्र नागरिक का नाम नहीं कटना चाहिए, लेकिन मतदाता सूची की त्रुटियों को दूर करने का विरोध भी बिना ठोस कारणों के उचित नहीं है।
लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों जवाबदेह हैं। ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ का मूल प्रश्न यही है—राजनीतिक संघर्ष संविधान के दायरे में होगा या आरोपों और अविश्वास के सहारे? चुनावी शुचिता, पात्र मतदाता के अधिकार, राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र की ताकत नारों में नहीं, निष्पक्ष प्रक्रिया, प्रमाण-आधारित बहस और जनता के जनादेश के सम्मान में निहित है।
