सागर। पूर्व गृहमंत्री एवं वरिष्ठ विधायक भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का जीवन केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि कर्म, धर्म, न्याय, पर्यावरण संरक्षण, नारी सम्मान और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा है। भगवान श्रीकृष्ण ने करीब पांच हजार वर्ष पूर्व गीता के माध्यम से मानव समाज को जो संदेश दिया, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने कर्म को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए यह भी बताया कि मनुष्य को धर्म के मार्ग पर चलते हुए अन्याय, अधर्म, अत्याचार और अहंकार के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। श्रीकृष्ण का पूरा जीवन संघर्षों से भरा रहा, लेकिन उन्होंने कभी परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी और धर्म की रक्षा के लिए निरंतर कार्य किया।

श्री सिंह ने खुरई के मंदिर श्रीदेव मुरलीधर, यादव मंदिर, किला गेट के सामने आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर शोभायात्रा एवं मटकी फोड़ कार्यक्रम में सहभागिता करते हुए उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि जन्माष्टमी का पर्व केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि कठिन परिस्थितियां मनुष्य की संभावनाओं को समाप्त नहीं कर सकतीं। राजा होने के बाद भी उन्होंने राजसुख का त्याग किया और धर्म की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। गीता में उन्होंने कर्म का महत्व बताते हुए मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करने की प्रेरणा दी। उनके जीवन और संदेश में कर्म के साथ भगवान की कृपा, धर्म के प्रति निष्ठा और सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी दिखाई देती है। इस दौरान भूपेन्द्र सिंह ने खुरई नगर पालिका भवन एवं मिडवे रेस्टोरेंट का निरीक्षण भी किया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता का संदेश भी मिलता है। यमुना में कालियानाग के विष के कारण जल प्रदूषित हो गया था और लोग उसका उपयोग नहीं कर पा रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण ने कालियानाग का दमन कर जल को प्रदूषण से मुक्त करने का संदेश दिया। इसी प्रकार गोवर्धन पूजा के प्रसंग में उन्होंने प्रकृति, पर्वत और पशुधन के महत्व को समझाया। श्रीकृष्ण ने गोकुलवासियों को यह संदेश दिया कि प्रकृति हमारे जीवन का आधार है और उसका संरक्षण तथा सम्मान करना आवश्यक है। गोवर्धन पर्वत उठाकर उन्होंने इंद्र के अहंकार को भी समाप्त करने का संदेश दिया। श्री सिंह ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में शोषण और अत्याचार के विरोध का संदेश भी स्पष्ट दिखाई देता है। कंस के अत्याचारों के खिलाफ श्रीकृष्ण का संघर्ष इसी भावना का प्रतीक था। आज मटकी फोड़ जैसे कार्यक्रम श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की स्मृति से जुड़े हैं, लेकिन इनके पीछे अत्याचार और शोषण के खिलाफ खड़े होने का संदेश भी देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण ने अपने जीवन से यह बताया कि अन्याय को स्वीकार करना उचित नहीं है और समाज को अत्याचार के विरुद्ध एकजुट होकर खड़ा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने नारी सम्मान की भी महत्वपूर्ण प्रेरणा दी। द्रौपदी के चीरहरण के प्रसंग में श्रीकृष्ण ने उसकी रक्षा कर यह संदेश दिया कि किसी भी महिला का अपमान केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। यदि समाज में एक महिला के सम्मान की रक्षा नहीं होगी तो हर महिला के मन में असुरक्षा का भाव पैदा होगा। इसलिए नारी सम्मान और उसकी गरिमा की रक्षा समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि नारी सम्मान और सशक्तिकरण का यह संदेश भगवान श्रीकृष्ण ने हजारों वर्ष पहले ही समाज के सामने रखा था। श्री सिंह ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने आचरण से यह भी बताया कि अधर्म और अन्याय से प्राप्त धन तथा सुख व्यक्ति की बुद्धि को भ्रष्ट कर देते हैं। जब दुर्योधन ने भगवान श्रीकृष्ण को अपने राजमहल में भोजन के लिए आमंत्रित किया तो उन्होंने उसके निमंत्रण को स्वीकार नहीं किया और विदुर के यहां भोजन किया। इसके माध्यम से श्रीकृष्ण ने यह संदेश दिया कि भोजन और संबंधों से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति के आचरण और उसके धर्म का पालन है। अधर्म के मार्ग से प्राप्त वैभव व्यक्ति को विलास और गलत दिशा की ओर ले जा सकता है। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण के जीवन से माता-पिता की जिम्मेदारी का भी महत्वपूर्ण संदेश मिलता है। गांधारी के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यदि माता-पिता को यह पता हो कि उनके बच्चे गलत रास्ते पर जा रहे हैं और फिर भी वे उन्हें रोकने का प्रयास नहीं करते, तो यह उनकी भी जिम्मेदारी बनती है। पुत्र मोह के कारण गलत को सही मान लेना अंततः परिवार और समाज दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। बच्चों को सही और गलत का अंतर समझाना तथा गलत रास्ते पर जाने से रोकना माता-पिता की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। श्री सिंह ने कहा कि महाभारत के प्रसंगों में भगवान श्रीकृष्ण ने यह भी स्पष्ट किया कि मनुष्य के निर्णय ही उसके भविष्य को निर्धारित करते हैं। दुर्योधन के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने बताया कि उसके सामने भगवान श्रीकृष्ण और उनकी नारायणी सेना में से किसी एक को चुनने का अवसर था, लेकिन उसने नारायणी सेना को चुना और योगेश्वर श्रीकृष्ण को छोड़ दिया। इससे यह संदेश मिलता है कि व्यक्ति को भौतिक शक्ति से अधिक विवेक, सत्य और सही मार्गदर्शन को प्राथमिकता देनी चाहिए। समाज में जब किसी के साथ अन्याय हो रहा हो, तब सामर्थ्यवान व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह उसके खिलाफ आवाज उठाए। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता भगवान श्रीकृष्ण का ऐसा ज्ञान है, जो आज भी पूरी दुनिया के लिए मार्गदर्शक है। गीता मनुष्य को संकट और कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने, अपने कर्तव्य का पालन करने और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। श्रीकृष्ण के जीवन में अनेक संकट आए, लेकिन उनके चेहरे की मुस्कान कभी समाप्त नहीं हुई। उन्होंने जीवन में विष भी पिया, संघर्ष भी किया और युद्ध भी किया, लेकिन हर परिस्थिति का सामना धैर्य और आत्मविश्वास के साथ किया। श्री सिंह ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का संदेश आज भी हमारे जीवन के लिए सफलता का सूत्र है। हमें धर्म के मार्ग पर चलते हुए अन्याय, अधर्म, अत्याचार और अहंकार के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। श्रीकृष्ण ने एक ओर प्रेम, करुणा और मानवता का संदेश दिया तो दूसरी ओर अधर्म के विनाश के लिए सुदर्शन चक्र उठाने का साहस भी दिखाया। यही संतुलन उनके जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा है। जन्माष्टमी का पर्व हमें उनके बताए मार्ग पर चलने, अच्छे कर्म करने और समाज में धर्म, न्याय, सद्भाव तथा सकारात्मकता को मजबूत करने का संकल्प लेने की प्रेरणा देता है।
कार्यक्रम में लक्ष्मीनारायण यादव पूर्व सांसद, मनोहर यादव अध्यक्ष, श्रीमती नन्हीबाई अहिरवार, देशराज यादव, राहुल चौधरी, लखन यादव, बलराम यादव, कल्लू यादव, जयराम यादव, सर्वराज यादव मंडीबामोरा, बंटी यादव बांदरी, पप्पू यादव बांदरी, साहब यादव, परमानंद यादव, सीताराम यादव, शैलेंद्र यादव, रब्बू यादव अनिल यादव, करतार यादव, बृजेश यादव, रोनक यादव, आशू यादव, कमलेश राय, राजू चंदेल सोनू चंदेल, राम शास्त्री, रश्मि सोनी, नीटू अजमानी, अर्चना जैन, माधवी कुर्मी उपस्थित रहे।

श्री सिंह ने खुरई के मंदिर श्रीदेव मुरलीधर, यादव मंदिर, किला गेट के सामने आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर शोभायात्रा एवं मटकी फोड़ कार्यक्रम में सहभागिता करते हुए उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि जन्माष्टमी का पर्व केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि कठिन परिस्थितियां मनुष्य की संभावनाओं को समाप्त नहीं कर सकतीं। राजा होने के बाद भी उन्होंने राजसुख का त्याग किया और धर्म की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। गीता में उन्होंने कर्म का महत्व बताते हुए मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करने की प्रेरणा दी। उनके जीवन और संदेश में कर्म के साथ भगवान की कृपा, धर्म के प्रति निष्ठा और सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी दिखाई देती है। इस दौरान भूपेन्द्र सिंह ने खुरई नगर पालिका भवन एवं मिडवे रेस्टोरेंट का निरीक्षण भी किया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता का संदेश भी मिलता है। यमुना में कालियानाग के विष के कारण जल प्रदूषित हो गया था और लोग उसका उपयोग नहीं कर पा रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण ने कालियानाग का दमन कर जल को प्रदूषण से मुक्त करने का संदेश दिया। इसी प्रकार गोवर्धन पूजा के प्रसंग में उन्होंने प्रकृति, पर्वत और पशुधन के महत्व को समझाया। श्रीकृष्ण ने गोकुलवासियों को यह संदेश दिया कि प्रकृति हमारे जीवन का आधार है और उसका संरक्षण तथा सम्मान करना आवश्यक है। गोवर्धन पर्वत उठाकर उन्होंने इंद्र के अहंकार को भी समाप्त करने का संदेश दिया। श्री सिंह ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में शोषण और अत्याचार के विरोध का संदेश भी स्पष्ट दिखाई देता है। कंस के अत्याचारों के खिलाफ श्रीकृष्ण का संघर्ष इसी भावना का प्रतीक था। आज मटकी फोड़ जैसे कार्यक्रम श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की स्मृति से जुड़े हैं, लेकिन इनके पीछे अत्याचार और शोषण के खिलाफ खड़े होने का संदेश भी देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण ने अपने जीवन से यह बताया कि अन्याय को स्वीकार करना उचित नहीं है और समाज को अत्याचार के विरुद्ध एकजुट होकर खड़ा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने नारी सम्मान की भी महत्वपूर्ण प्रेरणा दी। द्रौपदी के चीरहरण के प्रसंग में श्रीकृष्ण ने उसकी रक्षा कर यह संदेश दिया कि किसी भी महिला का अपमान केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। यदि समाज में एक महिला के सम्मान की रक्षा नहीं होगी तो हर महिला के मन में असुरक्षा का भाव पैदा होगा। इसलिए नारी सम्मान और उसकी गरिमा की रक्षा समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि नारी सम्मान और सशक्तिकरण का यह संदेश भगवान श्रीकृष्ण ने हजारों वर्ष पहले ही समाज के सामने रखा था। श्री सिंह ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने आचरण से यह भी बताया कि अधर्म और अन्याय से प्राप्त धन तथा सुख व्यक्ति की बुद्धि को भ्रष्ट कर देते हैं। जब दुर्योधन ने भगवान श्रीकृष्ण को अपने राजमहल में भोजन के लिए आमंत्रित किया तो उन्होंने उसके निमंत्रण को स्वीकार नहीं किया और विदुर के यहां भोजन किया। इसके माध्यम से श्रीकृष्ण ने यह संदेश दिया कि भोजन और संबंधों से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति के आचरण और उसके धर्म का पालन है। अधर्म के मार्ग से प्राप्त वैभव व्यक्ति को विलास और गलत दिशा की ओर ले जा सकता है। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण के जीवन से माता-पिता की जिम्मेदारी का भी महत्वपूर्ण संदेश मिलता है। गांधारी के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यदि माता-पिता को यह पता हो कि उनके बच्चे गलत रास्ते पर जा रहे हैं और फिर भी वे उन्हें रोकने का प्रयास नहीं करते, तो यह उनकी भी जिम्मेदारी बनती है। पुत्र मोह के कारण गलत को सही मान लेना अंततः परिवार और समाज दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। बच्चों को सही और गलत का अंतर समझाना तथा गलत रास्ते पर जाने से रोकना माता-पिता की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। श्री सिंह ने कहा कि महाभारत के प्रसंगों में भगवान श्रीकृष्ण ने यह भी स्पष्ट किया कि मनुष्य के निर्णय ही उसके भविष्य को निर्धारित करते हैं। दुर्योधन के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने बताया कि उसके सामने भगवान श्रीकृष्ण और उनकी नारायणी सेना में से किसी एक को चुनने का अवसर था, लेकिन उसने नारायणी सेना को चुना और योगेश्वर श्रीकृष्ण को छोड़ दिया। इससे यह संदेश मिलता है कि व्यक्ति को भौतिक शक्ति से अधिक विवेक, सत्य और सही मार्गदर्शन को प्राथमिकता देनी चाहिए। समाज में जब किसी के साथ अन्याय हो रहा हो, तब सामर्थ्यवान व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह उसके खिलाफ आवाज उठाए। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता भगवान श्रीकृष्ण का ऐसा ज्ञान है, जो आज भी पूरी दुनिया के लिए मार्गदर्शक है। गीता मनुष्य को संकट और कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने, अपने कर्तव्य का पालन करने और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। श्रीकृष्ण के जीवन में अनेक संकट आए, लेकिन उनके चेहरे की मुस्कान कभी समाप्त नहीं हुई। उन्होंने जीवन में विष भी पिया, संघर्ष भी किया और युद्ध भी किया, लेकिन हर परिस्थिति का सामना धैर्य और आत्मविश्वास के साथ किया। श्री सिंह ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का संदेश आज भी हमारे जीवन के लिए सफलता का सूत्र है। हमें धर्म के मार्ग पर चलते हुए अन्याय, अधर्म, अत्याचार और अहंकार के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। श्रीकृष्ण ने एक ओर प्रेम, करुणा और मानवता का संदेश दिया तो दूसरी ओर अधर्म के विनाश के लिए सुदर्शन चक्र उठाने का साहस भी दिखाया। यही संतुलन उनके जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा है। जन्माष्टमी का पर्व हमें उनके बताए मार्ग पर चलने, अच्छे कर्म करने और समाज में धर्म, न्याय, सद्भाव तथा सकारात्मकता को मजबूत करने का संकल्प लेने की प्रेरणा देता है।
कार्यक्रम में लक्ष्मीनारायण यादव पूर्व सांसद, मनोहर यादव अध्यक्ष, श्रीमती नन्हीबाई अहिरवार, देशराज यादव, राहुल चौधरी, लखन यादव, बलराम यादव, कल्लू यादव, जयराम यादव, सर्वराज यादव मंडीबामोरा, बंटी यादव बांदरी, पप्पू यादव बांदरी, साहब यादव, परमानंद यादव, सीताराम यादव, शैलेंद्र यादव, रब्बू यादव अनिल यादव, करतार यादव, बृजेश यादव, रोनक यादव, आशू यादव, कमलेश राय, राजू चंदेल सोनू चंदेल, राम शास्त्री, रश्मि सोनी, नीटू अजमानी, अर्चना जैन, माधवी कुर्मी उपस्थित रहे।
