*सन 1971 में हुई थी प्राण-प्रतिष्ठा*
मंदिर के पुजारी पंडित यशोवर्धन चौबे ने बताया कि उनके पिता पंडित प्रभाकर चौबे ने वर्ष 1962 में बरगद का पौधा लगाकर मंदिर निर्माण की नींव रखी थी। इसके बाद शहरवासियों के सहयोग से मंदिर का निर्माण कार्य आगे बढ़ा और वर्ष 1971 में मंदिर पूर्ण रूप से तैयार हुआ। मंदिर निर्माण में काले खां मोहम्मद हनीफ, कर्पूचंद डेंगरे, रामचंद्र भट्ट, गुलाबचंद बेशाखिया, फूंदी लाल नेमा, शंकरलाल गुप्ता सहित अनेक लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसी वर्ष तत्कालीन सांसद मनिभाई पटेल के सहयोग से मां सरस्वती की प्रतिमा की विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा की गई। उत्तरमुखी प्रतिमा होने के कारण इस मंदिर का विशेष धार्मिक महत्व है।
पंडित यशोवर्धन चौबे के अनुसार, मां सरस्वती ज्ञान की देवी हैं और उत्तर दिशा की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। इसी कारण यहां प्रतिमा की स्थापना उत्तरमुखी की गई है। एकल उत्तरमुखी आदमकद प्रतिमा वाला यह मंदिर अपने आप में विशिष्ट है। बसंत पंचमी पर यहां विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि माघ माह की पंचमी तिथि को मां सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। बसंत पंचमी पर विशेष रूप से मां सरस्वती की पूजा-आराधना की जाती है। उन्हें संगीत, कला, वाणी, विद्या और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। इस दिन विद्या आरंभ करने से ज्ञान में वृद्धि होती है। बसंत पंचमी को अबूझ मुहूर्त भी कहा जाता है, जिसमें बिना मुहूर्त के शुभ कार्य किए जा सकते हैं।
पंडित चौबे बताते हैं कि यदि किसी के विवाह में बाधा आ रही हो तो 108 बादाम की माला मां सरस्वती को अर्पित की जाती है। वहीं विद्यार्थी ज्ञानवर्धन के लिए 108 मखानों की माला चढ़ाते हैं। मान्यता है कि इससे मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
उन्होंने बताया कि सागर स्थित सरस्वती मंदिर की प्रतिमा विशेष है, जिसमें मां ऊंचे आसन पर विराजमान हैं, लेकिन उनके चरण भूमि को स्पर्श करते हैं। माला अर्पित करने के लिए समय और विधि का विशेष ध्यान रखा जाता है। सूर्यास्त से पूर्व माला अर्पित करना आवश्यक होता है। भूलवश भी बादाम की माला खड़ी प्रतिमा, छायाचित्र, फोटो या नामावली पर नहीं चढ़ानी चाहिए, क्योंकि यह श्रद्धा और विश्वास का विषय है, उपहास का नहीं।
बसंत पंचमी के अवसर पर मंदिर में प्रातःकाल से देर रात तक धार्मिक आयोजन चलते हैं। इस दौरान कुल 14 संस्कार कराए जाते हैं, जिनमें विशेष रूप से अक्षर आरंभ संस्कार शामिल है। इस संस्कार में अनार की लकड़ी और शहद से छोटे बच्चों की जीभ के अग्रभाग पर ‘ॐ’ की आकृति उकेरी जाती है, जिससे बच्चा विद्वान और ज्ञानवान बने।
